Monday, August 7, 2017

प्लीज़ पायरेसी को बढ़ावा न दे

४ अगस्त को शाहरुख़ खान की फिल्म "जब हैरी मेट सेजल" रिलीज़ हुई लेकिन निर्देशक इम्तियाज़ अली की इस फिल्म को दर्शक नहीं मिलें , जैसा कि हमेशा ही इम्तियाज़ की फिल्मों को मिलते रहे हैं.यह तो होना ही था जब एक ही स्क्रिप्ट पर बार - बार फिल्मे बनेगी तो, ख़ैर हम यहाँ बात कर रहे हैं ११ अगस्त को रिलीज़ होने वाली उस  फिल्म  , जो कि प्रधान मंत्री के स्वच्छ भारत अभियान का एक सन्देश कह सकते हैं. जी हाँ सही पहचाना हम "टॉयलेट - एक प्रेम कथा " की ही बात कर रहे हैं। जिसके बारें में पिछले दिनों यह सुनने में आया था कि यह फिल्म "ऑनलाइन लीक " हो गयी। इसके तुरंत बाद अक्षय कुमार ने सबसे रिक्वेस्ट की कि, "प्लीज़ पायरेसी को बढ़ावा न दे."  समझ नहीं आता कि फिल्म लीक कैसे हो जाती है और कहाँ होती है ? क्या सेंसर के लिए जाती है तब यह कांड हो जाता है या एडिटिंग टेबिल पर होता है , होता तो जरूर फिल्म के निर्माता , निर्देशक या एडिटर की टीम में से ही की कहीं से होता होगा , नहीं तो आम आदमी थोड़े ही अपने पेन ड्राइव में कॉपी कर लेता होगा। गलती होती उनके खुद के ही घर से होती है  और पायरेसी न करने की बात आम लोगों से की जाती है. 
आम आदमी तो इसका फायदा उठायेगा ही क्योंकि हर सप्ताह कोई न कोई फिल्म रिलीज़ होती है और  हर हीरो, हर निर्माता -- निर्देशक को अपनी फिल्म सफल बनानी है लेकिन टिकट रेट इतने ज्यादा हैं कि सब फ़िल्में देख सकना किसी के बस की बात नहीं है. हाँ यह बात सही है कि पाइरेसी को बढ़ावा नहीं देना चाहिए लेकिन इसके लिए फिल्म वालों को खुद को सुरक्षा रखनी चाहिए। इस बात पर उन्हें ध्यान रखना चाहिए "सावधानी हटी दुर्घटना घटी। "
वैसे यह बात ऐसी ही है जैसे देश में चीन का सामान बराबर बिकता है लेकिन जनता से यह उम्मीद की जाती है कि वो देश भक्ति दिखाये और न खरीदें। हर नागरिक में देश के लिए सम्मान और भक्ति होनी ही चाहिये लेकिन चीनी सामान न बिक़े इसके लिए सरकार को भी कुछ करना चाहिये। वैसे ही फिल्म लीक न हो इसके लिए फिल्म वालों को कड़ी सुरक्षा रखनी पड़ेगी। जनता भी पाइरेसी ख़िलाफ़ बीड़ा उठाये और फिल्म वाले भी। तभी सफलता मिलेगी ऐसे मिशन में। 
वैसे पहले भी कुछ फ़िल्में लीक हुई थी जिनमें उड़ता पंजाब थी और ग्रांड मस्ती जैसी सस्ती फिल्म थी।  इस फिल्म के लीक होने के बाद तो बाकायदा मीडिया को भी बुलाया था कि हमारी फिल्म इसलिए असफल हो गयी क्योकि फिल्म पहले ही लीक हो गयी थी। ग्रांड मस्ती वालों को सोचना चाहिए कि चलो इसी बहाने कुछ लोगो ने उनकी फिल्म को देखा,  नहीं तो वैसे ही उसका तो यही हाल होता।  वैसे यह आईडिया भी बुरा नहीं है जब फिल्म प्लॉप होने का अंदेशा हो तो ख़बर उड़ा दो कि हमारी फिल्म लीक हो गयी है। 

Friday, August 4, 2017

बॉलीवुड के गाइड -- पुराने और नये

आजकल हमारे हिंदी फ़िल्मी निर्माता - निर्देशकों पर गाइड को फिल्म का मुख्य किरदार बनाने में ज्यादा दिलचस्पी है। पिछले साल २०१६  में यशराज बैनर की फिल्म आयी थी "बेफ़िक्रे।  आदित्य चोपड़ा द्वारा निर्देशित इस फिल्म में अभिनेत्री वानी कपूर पेरिस में आने वाले पर्यटकों को पेरिस घुमाती थी यानि पेरिस में गाइड बनी थी और यहीं उनकी मुलाकात रनवीर सिंह से होती है खैर फिल्म की कहानी क्या थी और उसका क्या हाल हुआ था सभी जानते हैं। 
ऐसे ही गाइड के किरदार वाली फिल्म  "जब हैरी मेट सेजल" भी आज ही रिलीज़ हुई है इस फिल्म में भी शाहरुख़ खान गाइड बने हैं. इस फिल्म में वानी से बेहतर जॉब मिली है शाहरुख़ खान को। जहाँ वानी सिर्फ पेरिस की गाइड थी वहीं शाहरुख़ यूरोप के गाइड बने हैं। फिल्म "जब हैरी मेट सेजल"में भी शाहरुख़ सेजल यानि अनुष्का को यूरोप घुमाते है और आख़िरी में दोनों को मोहब्बत हो जाती है। पर शायद दर्शकों को इस फिल्म से ज्यादा मोहब्बत न हो। 
२०१३ में भी एक फिल्म आयी थी "शुद्ध देसी रोमांस " इस फिल्म में सुशांत सिंह राजपूत गाइड बने थे। यशराज की ही थी यह फिल्म भी. कुछ - कुछ कहानी भी "बेफ़िक्रे" जैसी ही थी। कुछ भी शुद्ध और देसी नहीं था सब विदेशी ही नकल थी। हाल फिल्म का सब जानते ही हैं। 
१९६५ में भी एक फिल्म आयी थी गाइड विषय पर ही ,फिल्म का नाम ही "गाइड " था  स्व देव साहब और वहीदा रहमान की जोड़ी थी इस फिल्म में । आर के नारायण के उपन्यास "गाइड " पर आधारित थी यह फिल्म। देव साहब राजू गाइड की भूमिका में थे और वहीदा रहमान विवाहित थी लेकिन दोनों में मोहब्बत हो जाती है।   इस फिल्म को दर्शकों की भी भरपूर मोहब्बत मिली।फिल्म ही लाज़वाब थी। 
Image result for jab harry met sejal१९६५ में जहाँ राजू गाइड भारत के एक इलाके का ही गाइड था।  अब २०१६ और २०१७ में देश ने हालाँकि बहुत तरक़्क़ी कर ली है लेकिन फिर भी आज के गाइड विदेशों में गाइड की नौकरी कर रहे हैं लेकिन प्यार उनका देसी ही है।  प्रधानमंत्री कह रहे हैं  देश में नौकरी बहुत अवसर हैं लेकिन अब गाइड विदेश जा रहे हैं नौकरी के लिये और फिर भी फिल्म को चला नहीं पा रहे हैं. देश के गाइड (राजू -  देव साहब ) ही अच्छे थे जिनकी फिल्म ने भरपूर कमाई की और आज भी जब फिल्म देखो बहुत ही अच्छी लगती है.

Friday, June 30, 2017

भीड़ का वहशीपन

क्या हो गया आज के लोगों को बात - बात में गुस्सा , बात - बात पर भीड़ इकक्ठा करके किसी भी इंसान को बहशी की तरह जान से मार देना। कभी किसी के टोकने पर ऐसा मत करो , वैसा मत करो कहने पर गुस्सा होकर लोगों को लेकर जान से मार देना। कभी गाय के नाम पर , कभी धर्म के नाम पर , कभी जाति के नाम पर, किसी औरत को बच्चा चुराने वाली समझ कर भीड़ द्वारा मार देने के समाचार हर रोज़ ही सुनने को मिलते हैं और तो और शर्म तो इस बात पर आती है कि स्मार्ट फोन से वीडियो बनाने का इतना शौक़ हो गया है लोगों को। ऐसे लोग विचलित कर देने वाली ऐसी घटनाओं के वीडियो बनाने से भी नहीं चूकते।  मज़े लेते हैं किसी के मरने का , यह नहीं कि जाकर किसी की सहायता करें। आज हर जुर्म भीड़ की आड़ में किया जा रहा है  चाहे वो बलात्कार हो या बिना कुछ कारण जाने बिना किसी व्यक्ति को पीट पीट कर मार देना।  क्या भीड़ में अपराध करने से वो कम हो जाता है या उसकी सज़ा कम मिलती है या मिलती ही नहीं इसलिए लोग ऐसा कदम उठाते हैं।  
भीड़ में इकट्ठा होकर लोग किसी असहाय की मदद क्यों नहीं करते , किसी लड़की की मदद क्यों नहीं करते , किसी शरीफ़ को जब लोग गुण्डे लाठी से पीटकर मार रहे होते हैं तो आगे आकर बचाते क्यों नहीं।  क्या सिर्फ़ भीड़ की शक्ल में अपराध ही करना चाहिये।  वैसे भी भीड़ में एक जुट होकर एक असहाय को मारने वाले बुज़दिल ही होते हैं हिम्मत वाले नहीं होते। अगर इतनी हिम्मत है किसी को मारने की तो जाओ सीमा पर और सीमा पार से आने वाले आतंकवादियों को मारो न कि किसी गरीब को। 

Tuesday, June 27, 2017

दोहरी मानसिकता पहलाज़ निहलानी की

सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष पहलाज़ निहलानी के बारें में कौन नहीं जानता।उनके फ़िल्म सेंसर करने के नियमों से भी सभी अच्छी तरह से वाकिफ़ हैं।अभी किस फ़िल्म में किस संवाद को फ़िल्म में रखना है या नहीं रखना है इसके लिये जनता के वोट मंगा रहे हैं और जब तक ये वोट आयेगें पक्ष और विपक्ष में। तब तक देश का छोटे से छोटा बच्चा भी उस सम्वाद को देख और सुन चुका होगा।  वैसे उनकी सेंसर की कैंची बड़े बैनर की फिल्मों पर कम ही चलती है और चलती भी तो बेवकूफी की बातों पर । साला खड़ूस फ़िल्म का शीर्षक तो ठीक है लेकिन फिल्म में संवाद में यह नहीं होना चाहिए। वैसे सेंसर करने के ये नियम कोई नये नहीं हैं ।  हॉरर फिल्म एक थी डायन को  यू/ ए सर्टिफिकेट मिला था जबकि सच में फ़िल्म को ए सर्टिफिकेट मिलना चाहिए था । एक छोटी फ़िल्म को बस इसलिये ए सर्टिफिकेट दिया क्योंकि उसमें सिर्फ आत्मा शब्द बोला गया था। पिछले दिनों आयी यशराज़ बैनर की फ़िल्म बेफिक्रे को भी यू/ए मिला जबकि सब जानते है कि फ़िल्म क्या और कैसी थी । फ़िल्म को यू/ए इसलिये दिया क्योंकि फ़िल्म में पेरिस की संस्कृति दिखाई थी । यह नही सोचा कि फ़िल्म को दर्शक  कहाँ के देखेगे पेरिस के कि भारत के। अब फ़िल्म जब हैरी मेट सेज़ल के साथ भी वहीं कर रहे हैं जो अपना काम है करो लाख लोगो के वोट मंगा कर फ़िल्म सेंसर होगी अब जैसे रीयल्टी शो वाले  ड्रामा करते है।

Thursday, May 26, 2016

आम इंसान सरबजीत के जीवन पर बनी फिल्म "सरबजीत "

पिछले दिनों फिल्म रिलीज़ हुई "सरबजीत ". इस फिल्म को लेकर बहुत चर्चा हो रही है कुछ लोगों ने इसे पसंद किया और कुछ लोगों ने इसे नकार दिया यह कर कि इस फिल्म का नाम तो दलबीर होना चाहिए साथ ही दलबीर का किरदार अभिनीत करने वाली अभिनेत्री ऐश्वर्या रॉय बच्चन के अभिनय को भी।  कोई कह रहा है उन्होंने अभिनय अच्छा नहीं किया , कोई कह रहा है पंजाबी अच्छी नहीं बोली और भी बहुत कुछ। हो सकता है फिल्म में कुछ खामियाँ होंगी लेकिन हम निर्देशक उमंग कुमार , ऐश्वर्या बच्चन, रणदीप हुडा और ऋचा चड्डा के इस प्रयास को सराहे बिना रह सकते कि उन्होंने अपने अभिनय के द्वारा उस सीधे सादे आम इंसान सरबजीत के जीवन पर बनी  फिल्म में अभिनय किया।  

सरबजीत कोई अमीर परिवार का लड़का नहीं था एक किसान था जो पंजाब के एक छोटे से गाँव में अपने परिवार के साथ रहता था एक रात शराब के नशे में कैसे वो कुछ कदम पाकिस्तान में रख देता है और क्या हो जाता है उसके बाद ?  उस पर एक आतंकवादी का इल्जाम लगा कर उसे फांसी की सज़ा सुना दी जाती है उसे उस गलती की सज़ा मिलती है जो की उसने की ही नहीं।  २३ साल वो पाकिस्तान की जेल में बिता देता है और जब बहन दलबीर के प्रयासों से जब उसे भारत आना होता है उसी रात पाकिस्तान की जेल में उस पर बेदर्दी के साथ हमला होता है और कुछ दिन पाकिस्तान के हॉस्पिटल में रहने के बाद उसकी मृत्यु हो जाती है।  एक आम आदमी और उसके परिवार की असली कहानी है सरबजीत की कहानी।  सोचो क्या बीती होगी सरबजीत के परिवार पर जब कई सालों उसका पता ही नहीं चला कि वो कहाँ है और सरबजीत पर कि उसकी पहचान ही बदल गयी किसी दूसरे व्यक्ति की गलती की सज़ा उसने भुगती और हमारी भारत सरकार कुछ कर ही नहीं सकी। 

रणदीप ने सरबजीत के किरदार को जिया बहुत ही उम्दा अभिनय। उस किरदार को परदे पर अभिनीत किया जिसका शायद कोई वीडियो भी उसने देखा नहीं होगा। क्योंकि शायद ही सरबजीत का कोई वीडियो होगा। ऐश्वर्या ने सरबजीत की बहन दलबीर का किरदार निभाया उस बहन की जिंदगी परदे पर दिखाई जिसने अपने भाई के जीवन को बचाने की कोशिश की लेकिन फिर भी असफलता ही उसके हाथ लगी। ऋचा चड्डा ने उस पत्नी का किरदार बहुत ही ख़ूबसूरती के साथ निभाया जिसका पति दो छोटी बच्चियों को छोड़कर ऐसा गया कि कभी लौट कर आया ही नहीं आया तो उसका पार्थिव शरीर। 

पिछले दिनों ऐश्वर्या की  पर्पल लिपस्टिक , फिल्म के प्रीमियर पर अभिषेक का उसका अकेला छोड़ जाना आदि विषयों पर तो निरर्थक बातें हुई पर उस पर एक भी लाइन नहीं लिखी गयी जिसे उसने ख़ूबसूरती से निभाया। 
 शायद ही इस फिल्म को लेकर किसी नेता मंत्री या सरकार ने कहा होगा की इस फिल्म टैक्स फ्री किया जाना चाहिए। हाँ सरबजीत कोई खिलाड़ी , शहीद नहीं था लेकिन एक आम इंसान था जिसने एक छोटी सी गलती की नशे में वो पाकिस्तान की सीमा में चला गया  और पाकिस्तान ने उसके साथ क्या किया ?



Monday, December 14, 2015

क्या सच में असहिष्णुता बढ़ गयी है ?

क्या सच में असहिष्णुता बढ़ गयी है ? यह सवाल आज कल हर किसी के जुबाँ और ज़ेहन में है ? क्या आपको सच में ऐसा लगता है कि आज के लोगों में सहनशीलता की बहुत कमी है , पहले के लोग ज्यादा सहनशील होते थे और किसी भी गलत बात पर कुछ नही बोलते थे और अपनी जुबान को सिल कर या  टेप लगा कर रखते थे।  नही ऐसा बिल्कुल नही है जैसे आज के लोग हैं वैसे ही पुराने समय के लोग हुआ करते थे फर्क बस इतना सा  है  कि पहले सोशल मीडिया नही था यानि लोगों के पास ऐसा कोई माध्यम नही था जिसमें लोग अपने विचार व्यक्त कर सकें , जिसके माध्यम से वो अपनी मन की बात उन लोगों तक पंहुचा सकें जिनकी बात से उनके दिल को चोट पंहुची हो और जिनकी बात से वो इत्तिफ़ाक़ न रखते हो. 
आज जब हर इन्सान को नेट पर काम करना आता है,   उसके पास फेसबुक और टिवटर है और उसके पास स्मार्ट फोन है,  वो इस फोन के साथ अपने आस -  पास की पल - पल की खबर  देकर एक पत्रकार बन गया है।  सही - गलत के बारें में निर्भीक होकर वो अपने विचार व्यक्त कर सकता है बस इतना ही फर्क  है आज के लोगों और पुराने लोगों में।  
आज के लोग सोशल मीडिया के माध्यम से पल में ही अपनी राय दे देते हैं जबकि पहले के लोग समाचार पत्रों को पढ़ कर अपने खाली समय में सही -  गलत को लेकर गाँव की चौपाल, किसी पान या चाय दुकान चर्चा किया करते थे या किसी के विचारों से सहमत न होने पर लोगों को एकत्र कर रैली निकाला करते थे जबकि अब फेसबुक और टिवटर पर हैश टैग करके सीधे - सीधे अपने विचार पंहुचा देते हैं। 
आज सोशल मीडिया इतना ज्यादा लोगों पर हावी है कि २४*७  चलने वाले न्यूज़ चैनल भी दर्शकों से टिवटर  पर प्रसारित समाचारों के बारें में राय मांगते हैं। 

Monday, March 9, 2015

सभी #T V चैनल इस तरह # #NDTV का अनुसरण करें

कल यानि ८ मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस सारे विश्व में मनाया गया।  इसी अवसर पर #BBC और NDTV के सहयोग से निर्भया पर बनी बहुचर्चित डाक्यूमेंट्री #India's Daughter पर भारत में प्रसारित करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया।  इसी के रोष में #NDTV ने अपने निर्धारित समय पर कल रात यानि 8 मार्च को  एक घंटा  #India's Daughter डाक्यूमेंट्री की तस्वीर दिखाई और कुछ भी कार्यक्रम प्रसारित नहीं किया। 

मैं यह बात नही कर रही कि अपना रोष व्यक्त करने का  #NDTV का यह तरीका अच्छा था या बुरा। लेकिन दर्शक बच गये होंगे करीब एक घंटा बेकार की चर्चा से , जो की हर चैनल पर बेवजह होती है समाचार कब प्रसारित होते हैं नही पता।  हाँ जब देखो #पैनल चर्चा होती है वही बेकार का मुद्दा और  पैनल के वही पुराने अतिथि. 

मेरे ख़्याल से सभी #T V चैनल इस तरह #एन डी टी वी  का अनुसरण करके कुछ -- कुछ घण्टे बारी -- बारी अपने चैनल को आराम दे तो कितना अच्छा है।  दर्शकों को भी कुछ आराम होगा और चैनल वाले भी इस इल्ज़ाम से बच जायेगें की कहाँ से लाये वो नये नये समाचार दर्शकों के लिए.